अंतर-फसल
भूमि, पानी व पोषक तत्त्वों के उचित उपयोग के लिए मक्की के साथ फलीदार फसलों को लगाना चाहिए। इसके लिए मक्की की दो कतारों के बीच सोयाबीन अथवा कम वर्षा वाले क्षेत्रों में माश / मूंग / रौंगी/ अरहर / सोयाबीन लगानी चाहिए। ऐसा करने से प्राकृतिक विपदाओं जैसे कम वर्षा और बिमारियों व कीड़ों का प्रकोप कम होता है। इसके अतिरिक्त फलीदार फसलें खरपतवारों को दबाए रखती हैं और साथ में ढलानदार खेतों में भूमि का सरंक्षण भी करती हैं।
यह ध्यान रखना चाहिए कि मक्की की फसल को अनुमोदित उर्वरक दें। जबकि साथ बीजने वाली सोयाबीन की फसल के लिए 15-20 कि.ग्रा. नाईट्रोजन व 20-25 कि.ग्रा. फास्फोरस तथा अरहर के लिए 7.5 कि.ग्रा. नाईट्रोजन व 22.5 कि.ग्रा. फास्फोरस प्रति हैक्टेयर अतिरिक्त दें।
यदि मक्की के साथ माश / मूंग बीजा हो तो कोई भी अतिरिक्त उर्वरक न दें। खंड-1 के निचले पर्वतीय क्षेत्र में मक्की की दो कतारों के बीच तिल की फसल लगाई जा सकती है।
जब कोई भी अन्य फसल मक्की में बीजनी हो तो उसके बीज की मात्रा अनुमोदित मात्रा का आधा कर देनी चाहिए।
फसल चक्र
खंड-1 में मक्की की फसल पर आधारित निम्नलिखित फसल चक्र लाभदायक है :
| (अ) | सिंचित क्षेत्र :- | मक्की-तोरिया-गेहूं-मक्की चारा |
| मक्की + रौंगी / सोयाबीन-तोरिया-गेहूं- मक्की चारा | ||
| (ब) | बारानी क्षेत्र :- | मक्की-गेहूं+चना |
| मक्की+सोयाबीन / उड़द-गेहूं+चना |



