जल प्रबंधन
धान की फसल में पानी की उपलब्धता का सीधा प्रभाव पड़ता है। फसल की बढ़ोतरी की सारी अवस्थाओं में पानी खड़ा रहना चाहिए। पानी की कमी के क्षेत्रों में खेतों का गीला रहना भी लाभदायक है। धान के खेतों में लगातार पानी रहने के कुछ लाभ निम्नलिखित हैं:
(1) फास्फोरस, लोहा व मैंगनीज तत्वों की अधिक उपलब्धता।
(2) खरपतवारों का दबा रहना।
अच्छे जल प्रबन्ध के लिए निम्नलिखित तरीकों को अपनाना चाहिए:
(1) नर्सरी केवल वहीं तैयार करें जहां पानी की उपलब्धता हो।
(2) खेतों को अच्छी तरह समतल करें।
(3) जहां पर सिंचाई की सुविधा न हो, वहां पर खेतों के किनारे 25-30 सें.मी. ऊंची मेढ़े बनाएं ताकि वारिश का पानी इकट्ठा किया जा सके।
(4) मच्च करने के समय खेत में 8-10 सें.मी. पानी रहना चाहिए और उसके बाद बढ़ोतरी की सारी अवस्थाओं में पानी खड़ा रखें।
(5) पौध की जड़ पकड़ने तक खेत में कम पानी खड़ा करें।
(6) प्रत्येक खेत में पानी खड़ा रखें। जहां सिंचाई के पानी का तापमान कम होता है, ऐसे स्थानों पर एक खेत से दूसरे खेत में पानी के बहने की प्रथा को खत्म करना चाहिए तथा 4-5 सें.मी. तक पानी खेत में खड़ा रखना चाहिए।
(7) उर्वरक डालने के दो दिन पहले खेत से पानी निकाल देना चाहिए।
(8) दौजियां निकलने और फूल आने की अवस्था आने पर 5-7 दिन के लिए खेत से पानी निकाल लें। इससे सल्फाइड जैसे जहरीले पदार्थ बाहर निकल जाते हैं और जड़ों को ऑक्सीजन मिलने में आसानी हो जाती है।

