जुताई व बिजाई
i. भूमि
मक्की की फसल के लिए अच्छे जल निकास वाली दोमट भूमि जिसमें पर्याप्त मात्रा में गली-सड़ी खाद व पोषक तत्व हों, अच्छी मानी गई है।
ii. भूमि की तैयारी
पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें ताकि खरपतवार व पौधों के अवशेष अच्छी तरह जमीन में दब जाएं। इसके पश्चात् 1-2 जुताइयां और करें और प्रत्येक जुताई के बाद सुहागा चलाएं ताकि मिट्टी भुरभुरी हो जाये ।
iii. बीज
20 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टेयर पर्याप्त होता है जिससे पौधों की उपयुक्त संख्या प्राप्त हो जाती है।
iv. बिजाई का ढंग
प्रदेश में किसान प्रायः मक्की की फसल को छट्टा विधि के साथ बीजते हैं जो सही तरीका नहीं है क्योंकि इससे पौधों में आपसी दूरी एक समान नहीं रह पाती जिससे उन्हें रोशनी, कार्बनडाईऑक्साइड, पोषक तत्वों एवं नमी की उपयुक्त प्राप्ति नहीं हो पाती और साथ में बीज या तो ऊपर सतह पर रह जाता है या नीचे गहरा चला जाता है। अतः अधिक उपज लेने के लिए मक्की को हल के पीछे 60 सै.मी. दूरी की कतारों में और बीज से बीज 20 सें.मी. की दूरी पर बीजना चाहिए जिससे 75,000 पौधे प्रति हैक्टेयर मिल सकें।
यदि एक हैक्टेयर क्षेत्र में 50,000 से कम पौधे हों तो पैदावार में बहुत अधिक कमी आ जाती है।
मक्की के बीज को 3-5 सै.मी. गहरा बीजना चाहिए ताकि अंकुरण सही हो । यदि बिजाई ढलानदार भूमि पर करनी हो जहां भूस्खलन की समस्या हो तो वहां पर कतारों को ढलान की विपरीत दिशा में रखकर बिजाई करनी चाहिए ।
v. बिजाई का समय
विभिन्न क्षेत्रों में मक्की की बिजाई के निम्नलिखित उपयुक्त समय हैं :
| ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र | 15 मई से जून के प्रथम सप्ताह तक परन्तु जहां वर्ष में केवल मक्की की ही फसल ली जाती है वहां 15 अप्रैल से 7 मई तक बिजाई करें। |
| मध्यवर्ती पर्वतीय क्षेत्र | 20 मई से 15 जून |
| निचले पर्वतीय क्षेत्र | 15 जून से 30 जून |
- ● चूंकि प्रदेश में मक्की की बिजाई मानसून की बारिशों पर निर्भर करती है अतः कोई भी निश्चित बिजाई का समय देना संम्भव नहीं है।
- ● खंड़-2 में बिजाई का समय मानसून के आने पर थोड़ा बदला जा सकता है और यदि प्रतिकूल परिस्थितियों में मक्की की बिजाई न हो सके तो अगस्त के पहले सप्ताह तक माश या कुल्थी की बिजाई की जा सकती है। यदि बिजाई में देरी हो जाये तो फलीदार फसलें साथ में बीजनी चाहिए।



