फ्रासबीन प्रदेश के हर क्षेत्र में नकदी एवं बेमौसमी सब्जी व बीज के लिए उगाई जाती है। निचले क्षेत्रों में इसकी खेती बसन्त ग्रीष्म व पतझड़ शीत ऋतु में की जाती है। जबकि मध्य तथा ऊंचे क्षेत्रों में इसकी बीजाई मार्च से जून तक की जाती है।
फ्रासबीन की खेती
निवेश सामग्री
| प्रति हैक्टेयर | प्रति बीघा | प्रति कनाल | |
| बीज (बौनी) (कि. ग्रा.) | 75 | 6 | 3 |
| बीज (ऊंची) (कि. ग्रा.) | 30 | 2.5 | 1.25 |
| गोबर की खाद (क्विंटल) | 200 | 16 | 8 |
| विधि-1 | |||
| यूरिया (कि. ग्रा.) | 110 | 8.8 | 4.4 |
| सुपरफॉस्फेट (कि. ग्रा.) | 625 | 50 | 25 |
| म्यूरेट ऑफ पोटाश (कि. ग्रा.) | 85 | 7 | 3.5 |
| विधि-2 | |||
| 12:32:16 मिश्रित खाद (कि. ग्रा.) | 313 | 25 | 12.5 |
| म्यूरेट ऑफ पोटाश (कि. ग्रा.) | — | — | — |
| यूरिया (कि. ग्रा.) | 26 | 2.1 | 1.05 |
| खरपतवार नियंत्रण | |||
| लासो (लीटर) या | 3 | 240 मि.ली. | 120 मि.ली. |
| पैण्डिमिथिलिन (स्टाम्प) लीटर या | 4 | 320 मि.ली. | 160 मि.ली. |
| थायोबेनकार्ब (सैटरन) लीटर या | 4 | 320 मि.ली. | 160 मि.ली. |
| फ्लुक्लोरालिन (बासालिन) लीटर | 2.5 | 200 मि.ली. | 100 मि.ली. |
नोट: स्टाम्प या लासो का बिजाई के तुरन्त बाद (24 से 48 घन्टे तक) छिड़काव करें और छिड़काव के बाद दवाई की परत को मिट्टी से ना हिलाएं।
बिजाई
| निचले क्षेत्र | फरवरी-मार्च, अगस्त-सितम्बर |
| मध्य क्षेत्र | मार्च-अप्रैल, जून (केवल ऊंची किस्में) |
| ऊंचे क्षेत्र | अप्रैल-जून |
अनुमोदित किस्में
इसकी दो प्रकार की किस्में झाड़ीदार या बौनी तथा बेलनुमा प्रचलित है। बौनी या झाड़ीदार किस्में कम समय में जल्दी पकने वाली तथा बिना किसी सहारे से उगाई जाती है। ऊंची किस्में मध्य तथा ऊंचे क्षेत्रों में आसानी से उगाई जाती हैं तथा इन्हें उगाने के लिए सहारे (झांबे इत्यादि) की आवश्यकता होती हैं।
किस्में |
विशेषताएँ |
बौनी या झाड़ीदार किस्में |
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| कंटैन्डर |
इसकी फलियां गहरे हरे रंग की, रेशा रहित तथा नीचे से मुड़ी होती है। औसत उपज 75-100 क्विंटल प्रति हैक्टेयर। |
| पूसा पार्वती |
फलियां हरे रंग की, रेशे वाली, चपटी तथा सीधी होती है। औसत उपज 100-125 क्विंटल प्रति हैक्टेयर। |
| वी एल बौनी-1 |
फलियां हरे रंग की, रेशा रहित, मोटी तथा नीचे से थोड़ी सी मुड़ी हुई होती है। औसत उपज 90-100 क्विंटल प्रति हैक्टेयर। |
| अर्का कोमल | फलियाँ गहरे हरे रंग, सीधी व रेशा रहित होती हैं। यह एन्थेक्नोज़ बीमारी के लिए भी प्रतिरोधी है। |
| सोलन नैना |
इसकी फलियां गहरे हरे रंग की व सीधी होती है। लगभग 45 दिनों में तुड़ान के लिए फलियाँ तैयार होती हैं। औसत उपज 125-140 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है। |
| पालम मृदुला |
यह किस्म लगभग 50 दिन में पहले तुड़ान के लिए तैयार हो जाती है। इसकी फलियां, आकर्षक, सीधी, गोल, रेशा रहित व हरे रंग की होती है। पौधे मध्यम ऊंचाई के तथा तना मोटा जिससे सहारा देने की जरूरत नहीं होती है। औसत उपज 135 क्विंटल प्रति हैक्टेयर। |
बेलनुमा या ऊंची किस्में |
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| एस. वी. एम.-1 |
फलियां गहरे रंग की, गोल सीधी एवं कम रेशेदार होती हैं। यह ऐन्गुलर लीफ स्पाट रोग प्रतिरोधी किस्म है। औसत उपज 100-125 क्विंटल प्रति हैक्टेयर। |
| लक्ष्मी (पी-37) |
फलियां आकर्षक हरे रंग की, 3 फलियां प्रति गुच्छा, चपटी-गोल तथा रेशे-रहित होती है। औसत उपज 160 क्विंटल प्रति हैक्टेयर। |
| कैंटुकी वन्डर |
फलियां लम्बी व गुदद्वार, मुड़ी हुई, 65 दिनों में तैयार होती है। औसत उपज 100-125 क्विंटल प्रति हैक्टेयर। |
सस्य कियाएं
विधि-1: गोबर की गली-सड़ी खाद हल चलाने से पहले खेत में डाल दें तथा 2-3 बार हल चलाकर खेत को अच्छी तरह तैयार कर लें। यूरिया खाद, सुपरफास्फेट तथा म्यूरेट ऑफ पोटाश की सारी मात्रा बिजाई से पहले कतारों में डालें।
विधि-2: गोबर की खाद, 12:32:16 मिश्रित खाद व यूरिया खाद की सारी मात्रा खेत तैयार करते समय डालें।
बौनी किस्मों में कतारों की दूरी 45 सें. मी. तथा ऊंची या बेलनुमा किस्मों में 90 सैं. मी. का अन्तर रखें। बिजाई 5-6 सें. मी. के अन्तर पर करें तथा बाद में पौधों में 12-15 सैं. मी. का अन्तर रखें। ऊंची किस्मों की बीजाई मेंढें बनाकर करें तथा इन्हें उचित समय पर (बिजाई के 15-20 दिन बाद) झांबों या प्लास्टिक की सूतली इत्यादि से सहारा दें लेकिन अधिक उपज लेने के लिए बेलनुमा या ऊंची किस्मों को मक्की के साथ इस तरह से लगाएं ताकि बेलें मक्की के पौधों पर चढ़ सकें।
प्रदेश के समशीतोष्ण क्षेत्रों में ऐसा पाया गया है कि फासॅबीन की कतारों के बीच में अगर बन्दगोभी की फसल लगाई जाये तो पैदावार अधिक प्राप्त होती है। किसान अधिक आय पाने के लिए फासॅबीन व बंदगोभी एक के बाद एक पंक्तियों मे लगाकर अधिक आय प्राप्त कर सकते है।
निराई-गुड़ाई, खरपतवार नियन्त्रण व जल-प्रबन्ध
निराई-गुड़ाई व खरपतवार नियन्त्रण
अधिक उपज लेने के लिए बिजाई के 2-3 सप्ताह बाद तथा फूल आने से पहले निराई-गुड़ाई करें। वार्षिक खरपतवारों की रोकथाम के लिए फसल उगने से पहले एलाक्लोर (लासो) 1.5 कि.ग्रा. (स.प.) या थायोबेनकार्ब (सैटरन) 2 कि.ग्रा. (स.प.) या पैन्डीमिथालिन (स्टाम्प) 1.2 कि.ग्रा. (स.प.) या फलुक्लोरालिन (बासालिन) 1.35 कि.ग्रा. (स. प.) को 750-800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर छिड़काव करें। यदि मोथा खरपतवार की समस्या हो तो लासो का छिड़काव करें। हाथ से खरपतवार निकालने पर फसल की अधिक बढ़ौतरी होती है।
जल-प्रबन्ध
फसल में 5-7 दिन के अन्तराल पर तथा आवश्यकतानुसार सिंचाई करना लाभदायक होता है। फूल आने तथा फलियों के विकास के समय सिंचाई बहुत ही लाभकारी होती है।
पौध सरंक्षण
लक्षण / आकमण |
उपचार |
| बीमारियां | |
| एन्थाक्नोज़ : फलियों पर भूरे रंग के धंसे हुए धब्बे दिखाई देते हैं। |
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| राइजोक्टोनिया वेब ब्लाईटः भूमि के साथ ही तने पर विशेष किस्म के लाल-भूरे रंग के धंसे हुए चिन्ह बनने लगते हैं। |
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| कोणदार पत्ता धब्बा रोगः पत्तों की निचली सतह पर लाल भूरे कोणदार धब्बे पड़ जाते हैं जिनके ऊपर काले रंग के कांटे की तरह चिन्ह पाए जाते हैं। |
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| फ्लोरी लीफ स्पॉट : पत्तों के निचली ओर आटे जैसे फफूंद के सफेद धब्बे पड़ने लगते है। |
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| झुलसा रोग : पत्तों पर छोटे-छोटे पीले पारदर्शी धब्बे दिखते हैं। पत्ते पीले पड़ जाते हैं तथा उन पर लाल धारियां व चिन्ह भी आ जाते हैं। |
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| सामान्य पत्ता मुड़न रोग (कॉमन मोजैक): पत्ते हरेपन के अभाव के बाद भीतर को मुड़ने लगते हैं। शिराओं के आस-पास मुरझाना आता है, फलियां कम लगती हैं। उनमें बीज भी कम बनते हैं। पौधे छोटे आकार के रहते हैं। |
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| कीट | |
| माईटस : पौधे के कोमल भागों से रस चूसते हैं। हरापन नष्ट होने पर पत्तों पर सफेद चकते बनने लगते हैं। पौधा सूख कर नष्ट हो जाता है। | इनका संक्रमण होते ही 100 मि.ली. मैलाथियान (साईथियान 50 ई. सी.) या डाइकोफाल (हैक्साकिल / कैलथेन / हिलफोल 18.5 ई.सी.) को 100 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। |
| ब्लिस्टर बीटल : ये कीट फूल और फलियां पर पलते हैं जिससे फलियां कम बनती हैं। | फसल पर 100 मि.ली. साईपरमेथरिन (रिपकार्ड 10 ईसी) या 100 मि.ली. डेल्टामैथ्रीन (डैसिस 2.8 ई. सी.) प्रति 100 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। |
| बीन बग: शिशु तथा प्रौढ़ पत्तों की निचली तरफ से रस चूसते हैं। अति प्रभावित भाग पीले पड़ जाते हैं और पत्ते गिर जाते हैं। | फूल आने तथा फल बनने से पहले फसल पर 100 मि. ली. डाइमेथोएट (रोगर 30 ई. सी.) को 100 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर छिड़काव करें। |
एकीकृत छिड़काव सारणी
1. बिजाई के लिए स्वस्थ बीज लें।
2. बिजाई से पूर्व बीज को चार घण्टे के लिए 1 ग्राम स्ट्रेप्टोसाईक्कलिन और 25 ग्राम हैक्साकैप के 10 लीटर पानी के घोल में भिगोयें।
3. संक्रमित क्षेत्रों में 8-10 दिन के अन्तराल पर बैविस्टिन 50 डब्लयु. पी. (10 ग्राम/ 10 लीटर पानी) अथवा इण्डोफिल एम-45 (25 ग्राम/ 10 लीटर पानी) का छिड़काव करें।
4. सामान्य मोजैक रोग से बचाव के लिए कन्टेंडर और कैण्टुकी वंडर जैसी प्रतिरोधी किस्में लगायें।
5. सामान्य मोजैक की समस्या होने पर मैलाथियान 50 ई. सी. (10 मि. ली./10 लीटर पानी) का छिड़काव करें।
कटाई एवं उपज
तुड़ाई
तुड़ाई उस समय करें जब फलियाँ वांछित आकार ले चुकी हों तथा बीज अभी नर्म हो। अधिक आय के लिए फलियों को उनके हरेपन या चमक खोने से पहले ही तोड़ लें । बौनी किस्में 50-60 दिनों में तथा बेलनुमा या ऊंची किस्में 65-70 दिनों में पहली तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है।
यार्ड लौंग बीन / मीटर फली की सस्य क्रियाएं फ्रॉसबीन की रेलनुमा किस्मों में अनुमोदित सिफारिशों को अपनाएं।
उपज
| किस्में | प्रति हैक्टेयर | प्रति बीघा प्रति | प्रति कनाल |
| बौनी किस्में (क्विंटल) | 75-100 | 6-8 | 3-4 |
| ऊंची किस्में (क्विंटल) | 100-150 | 8-12 | 4-6 |
बीज उत्पादन
बीज उत्पादन
बीज उत्पादन सामान्य फसल की तरह ही है लेकिन मध्य तथा ऊंचे क्षेत्र इसके बीज उत्पादन के लिए अधिक उपयुक्त हैं। दो किस्मों के बीच कम से कम 25 मीटर का अन्तर रखें ताकि बीज फसल की तुड़ाई के समय मिलावट न हो।
बीज फसल में अवांछनीय पौधों को फूल आने से पूर्व, फूल आने पर तथा फल लगने के बाद (मण्डीकरण योग्य अवस्था) खेत से निकाल देना चाहिए। बीमारी एवं विषाणु ग्रसित पौधों को बीज फसल से निकाल देना चाहिए।
जब अधिकांश फलियां पक कर पीली पड़ने लगें या सूख जाएं तो पौधों को उखाड़ लें या सूखी फलियां तोड़ लें। 10-15 दिन के बाद इन फलियों से बीज निकालें। इसे साफ करके और अच्छी तरह सुखाकर भण्डारण करें।
बीज उपज
| किस्में | प्रति हैक्टेयर | प्रति बीघा | प्रति कनाल |
| बौनी किस्में | 10-12 (क्विंटल) | 80-100 कि.ग्रा. | 40-50 कि.ग्रा. |
| ऊंची किस्में | 15-20 (क्विंटल) | 120-160 कि.ग्रा. | 60-80 कि.ग्रा. |
यार्ड लॉन्ग बीन / शतावरी बीन की खेती
सस्य क्रियाएं: शतावरी बीन की खेती के लिए बेलनुमा फ्रॉसबीन में अपनाई जाने वाली सस्य क्रियाएं अपनाएं।
अनुमोदित किस्में
किस्में |
विशेषताएँ |
| पालम लॉन्ग बीन |
यह शतावरी बीन / यार्ड लॉन्ग बीन की हिमाचल प्रदेश के लिए पहली सिफारिश है। पौधे अनिश्चित बढबार, 240-250 सेंटीमीटर की ऊँचाई तक जा सकते हैं, इसलिए पूर्ण गुणवता उत्पादन के लिए स्टेकिंग की आवश्यकता होती है। बुआई के लगभग 60 दिनों में पहली तुड़ान के लिए तैयार हो जाती है। फली बहुत लंबी (40-45 सेंमी), आकर्षक, हल्की हरी, मांसल, कोमल, रसदार और कठोर होती है। औसत उपज 110-120 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। बीन एन्थ्रेक्नोज के लिए प्रतिरोधी क्षमता रखती है। बीज मध्यम आकार और काले रंग के होते हैं। यह किस्म हिमाचल प्रदेश के निम्न और मध्य पर्वतीय क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। |



