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Department of Agriculture

Himachal Pradesh

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      Himachal Pradesh

        किस्में

        विभिन्न क्षेत्रों के लिए मक्की की अनुमोदित किस्में:

        किस्में

        विशेषताएँ

        गिरिजा कम्पोजिट
        • ● इस किस्म को प्रदेश के निचले व मध्यवर्ती एवं अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों की उन भूमियों में जहां पानी का निकास न होता हो, के लिए अनुमोदित किया गया है।
        • ● यह समय पर तैयार होने वाली व अधिक उपज देने वाली किस्म है।
        • ● इसके पौधे मध्यम लम्बाई, तना मोटा, पत्ते गहरे हरे व सीधे होते हैं तथा गिरते नहीं है।
        • ● इस किस्म में पौधे पर दो भुट्टे लगते हैं जिनमें ऊपर कसा हुआ छिलका होता है।
        • ● इसके दाने हल्के नांरगी रंग के व कठोर होते हैं।
        • ● यह किस्म 110 दिनों में तैयार हो जाती है तथा उपज 40 क्विंटल / हैक्टेयर के लगभग है।
        बजौरा मक्का
        • ● यह किस्म जल्दी तैयार होने वाली, मध्यवर्ती एवं ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है।
        • ● इसके दाने चमकीले, नारंगी व कठोर होते हैं। इसमें भुट्टे पौधे के बीच में लगते हैं। अतः तोड़ने में सुविधा रहती है व पौधे गिरते नहीं है।
        • ● यह किस्म मेडिस टरसिकम झुलसा रोग सहनशील है।
        • ● यह किस्म 85-94 दिनों में तैयार होती है तथा उपज 35-38 क्विटल प्रति हैक्टेयर के लगभग है।
        एच.क्यू.पी.एम.-1
        • ● यह अधिक पैदावार देने वाली उच्च गुणवत्ता वाली प्रोटीन से भरपूर एकल क्रास संकर मक्की की किस्म है। इस संकर किस्म में सामान्य मक्की की अपेक्षा दो अनिवार्य अमीनो एसिड (लाइसीन एवं ट्रिप्टोफेन) की दुगनी मात्रा पाई जाती है।
        • ● इसकी खेती से लोगों की कुपोषण की समस्या के निदान के साथ-2 पशु-मुर्गी व दाना उद्योग को भी बढ़ावा मिलेगा।
        • ● इस किस्म के भुट्टे लम्बे व गोलाकार होते हैं तथा दाने-पीले पिचके (डेंट) हुए जिनका भार 280-290 ग्राम प्रति 1000 दाने होता है।
        • ● पौधे मध्यम उंचाई वाले, पत्ते-मध्यम चौड़े व गहरे हरे रंग के होते हैं। तने मोटे होते हैं और भुट्टा पौधे के मध्य भाग पर लगता है, इसलिए इसमें हवा से गिरने की समस्या नहीं होती है।
        • ● यह संकर किस्म खादों की अधिक मात्रा के प्रति अति प्रतिक्रियाशील है। इसकी औसत पैदावार 68-70 क्विटल/हैक्टेयर है।
        • ● यह किस्म मेडिस टरसिकम झुलसा रोग अवरोधी है तथा 110-112 दिन में पक कर तैयार हो जाती है।
        • ● यह किस्म प्रदेश के निचले व मध्यवर्ती (1200 मी. उंचाई तक) क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। दो इनब्रैड एच.के.आई. 193-1 (मादा) और एच. के. आई. 163 (नर) इनब्रैड से तैयार की गई है, जिनकी औसत उपज 20 क्विटल/हैक्टेयर है इसलिए इस संकर किस्म का बीज उत्पादन आर्थिक रूप से फायदेमंद है।
        पी.एम.जैड.-4
        • ● यह अधिक पैदावार देने वाली मध्यम अवधि की संकर किस्म है जो सिंचित व असिंचित दोनों क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है।
        • ● इसका पौध मध्यम ऊंचाई वाला और पत्तियां चौड़ी तथा आधी झुकी हुई होती है। भुट्टे लम्बे एवं मोटे होते हैं जो पौधे के मध्य में लगते हैं। इसके दाने मोटे, सेमी फलिंट एवं सुनहरी पीले रंग के होते है तथा एक भुट्टे में लगभग 400 दाने होते हैं।
        • ● यह किस्म हरे भुट्टे और दाने दोनों के लिए उपयुक्त है। इसके पौधे का तना मोटा होता है जिससे इसके गिरने की सम्भावना कम होती है।
        • ● इस किस्म की तना गलन रोग रोधक क्षमता साधारण है और पत्तियों को प्रभावित करने वाले रोगों को सहने की क्षमता काफी अच्छी है।
        • ● इसकी औसत पैदावार 78 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है। यह किस्म 96-105 दिन में तैयार हो जाती है।
        • ● अच्छी पैदावार देने के कारण यह किस्म प्रदेश में सबसे लोकप्रिय है एवं प्रदेश के हर क्षेत्र में उगाई जाती है और इसका किसान की आमदनी बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है। हाईब्रिड किस्म होने के कारण इसका बीज हर बार नया ही इस्तेमाल करना होता है।
        बजौरा पॉप कार्न
        • ● यह विशेष प्रकार की मक्की है जो कि पॉप कार्न के लिए उपयुक्त है व हिमाचल के निचले व मध्यवर्ती क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है, और भूनने पर बीस गुना ज्यादा फूल जाती है।
        • ● इस किस्म के दाने छोटे, मोतियों की तरह गोल, सख्त, चमकीले ओर संतरी-पीले फ्लिंट होते हैं। इसके 1000 दानों का वजन लगभग 120 ग्राम होता है।
        • ● इसकी पत्तियां संकरी, नरमंजरी बड़ी व खुली तथा पौधे मध्यम उंचाई के होते हैं। भुट्टे लम्बे एवं पतले जो पौधे के मध्य में लगते हैं।
        • ● इस पॉप कार्न की औसतन पैदावार 25-28 क्विटल/हैक्टेयर है।
        • ● यह किस्म 95-100 दिन में पक कर तैयार हो जाती है।
        • ● प्रमुख पत्ता झुलसा रोगों के प्रति सहनशील पाई गई है।
        • ● यह विशेष प्रकार की मक्की सामान्य दाने वाली मक्की से 6-7 गुना अधिक आय अर्जित कर सकती है और किसान इसे नकदी फसल के रूप में अपनाकर अपनी आर्थिक दशा सुधार सकते हैं।
        बजौरा स्वीट कार्न
        • ● मीठी मक्की ताजा खाने के लिए एवं संसाधित पदार्थों के रूप में उपयोग के लिए प्रचलित है। मीठी मक्की में शर्करा की मात्रा अधिक होने के कारण सामान्य मक्की से भिन्न होती है।
        • ● शर्करा की अधिकतम मात्रा परागण के 18-21 दिन के अंतराल में पाई जाती है और यह समय हरे भुट्टे की तुड़ाई के लिए अति उपयुक्त है।
        • ● इस किस्म के दानों के छिलके (पेरीकार्प) सामान्य मक्की के दानों की तुलना में पतले होते हैं जो इसको अधिक मुलायम बनाते हैं।
        • ● इस किस्म के पौधों के तने मध्यम-ऊंचाई तथा मोटे होते हैं। पत्ते गहरे हरे, नरमंजरी बड़ी व खुली, रेशा लाल होता है।
        • ● प्रत्येक पौधे के मध्य में 1-2 भुट्टे लगते हैं जिनका कसा हुआ छिल्का होता है। इसके दाने कम सिकुड़े हुए तथा पीले सुनहरे रंग के होते हैं जिनमें 20-22 प्रतिशत शर्करा की मात्रा होती है।
        • ● यह किस्म 100-105 दिन में पक कर तैयार हो जाती है तथा इसकी औसत पैदावार 28-30 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है ।
        • ● यह किस्म निचले व मध्यवर्ती क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है।
        पालम संकर मक्का-2
        • ● यह अधिक पैदावार देने वाली मध्यम अवधि की सिंगल क्रॉस संकर किस्म है।
        • ● यह हिमाचल प्रदेश के नीचले व मध्यवर्ती क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। इसकी पत्तियां चौड़ी, गहरे हरे रंग की तथा झुकी हुई होती है।
        • ● पौध मध्यम ऊंचाई वाला तथा भुट्टे बीच में लगते हैं। इसके दाने पीले व सेमी फलिंट होते हैं।
        • ● यह किस्म टर्सिकम व मेडिस लीफ ब्लाइट के लिए अवरोधी है।
        • ● औसत उपज 68-70 क्विंटल / हैक्टेयर है।