रोग प्रबंधन
आक्रमण / लक्षण |
नियंत्रण |
| चूर्णलासिता रोग: पौधे के सभी भागों पर सफेद हल्के रंग के धब्बे पड़ जाते है। |
रोग के लक्षण देखते ही कैराथेन (5 मि. ली) या वैटेबल सल्फर (20 ग्राम) या बैविस्टिन (5 ग्राम) या वेकार (5 ग्राम) या बैलिटान (5 ग्राम) का 10 लीटर पानी में छिड़काव करें। यदि आवश्यक हो तो 10-15 दिन के बाद पुनः छिड़काव करें। टेबूकानोजोल (4 ग्राम प्रति 10 ली. पानी) सितारा (5 ग्राम प्रति 10 ली. पानी) या कान्टाफ (5 ग्राम प्रति 10 ली. पानी) (हैक्साकोनाजोल 5 ई. सी.) का 15-20 दिन के अन्तराल पर या शेयर (4 ग्राम प्रति ली. पानी) का 10 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें। |
| एसोकोचाइटा/ माइकोस्फेरेला ब्लाइट: प्रभावित पौधे मुरझा जाते हैं। जड़ें भूरी हो जाती हैं। पत्तों और तनों पर भूरे धब्बे पड़ जाते है। इस बीमारी से फसल कमजोर पड़ जाती है। | ● मोटे और स्वस्थ बीज का प्रयोग करें। ● बीज का बैविस्टिन (2.5 ग्रा/कि.ग्रा.) से उपचार करें। ● रोग ग्रसित पौधों को नष्ट कर दें। ● हल्की सिंचाई दें व जल निकासी का उचित प्रबन्ध करें।फूल आने पर फसल में बैविस्टिन 50 डब्लयू पी (10 ग्राम/10 लीटर पानी) या मैन्कोज़ैब 75 डब्लयू पी (25 ग्राम/10 लीटर पानी) का 10-15 दिन के अन्तर पर 4-5 छिड़काव करें। |
| फ्यूजेरियम विल्ट रोग: जड़ें सड़ जाती हैं। तथा पौधे पीले होकर मुरझा जाते हैं। | ● बीज को बैविस्टिन (3 ग्राम /10 लीटर पानी) से उपचार करने के बाद बोएं। ● संक्रमित क्षेत्रों में तीन वर्षीय फसल चक अपनायें। |
| ब्राउन रस्ट रोग: पत्तों, तनों फलियों पर भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं। | फसल को हैक्साकोनोज 5 ई.सी. (कान्टाफ) या टील्ट 25 ई.सी. या फोलीकुर 250 ई डब्ल्यू 1 ग्राम प्रति लीटर या वायकॉर (5 ग्राम प्रति लीटर पानी) या स्कोर (5 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी) या इण्डोफिल एम-45 (2.5 ग्राम प्रति 1 लीटर पानी) + बेविस्टिन (1 ग्राम प्रति 1 लीटर पानी) का छिड़काव करें तथा आवश्यकतानुसार 15 दिन के अन्तराल पर दोबारा छिड़काव किया जा सकता है। |
| बैक्टीरियल ब्लाईट: भूरे रंग के पनीले धब्बे तने, शाखाओं के जोड़ो, फलियों तथा पत्तियों के किनारों पर पड़ जाते हैं। रोग के अगेते प्रकोप से पौधे पूरी तरह मुरझा जाते हैं। | ● स्वस्थ बीज का प्रयोग करें और प्रदेश के गर्म स्थानों में तैयार बीज का प्रयोग करें। ● बीज का स्ट्रैप्टोसाईकलिन के घोल (100 मि.ली. प्रति लीटर पानी) में 2 घण्टे तक शोधित करें। बाद में इसी रसायन (1 ग्रा/10 लीटर पानी) का घोल छिड़के। यदि आवश्यक हो तो 7 दिन बाद फिर छिडकाव करें। ● रोगग्रस्त भागों को एकत्र करके जला दें। ● तीन वर्षीय फसल चक अपनायें। ● जल निकासी का उचित प्रबन्ध करें और फसल की सिंचाई करें। ● नवम्बर के दूसरे पखवाड़े में बीजी गई फसल पर बीमारी का कम प्रकोप होता है। |



