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Department of Agriculture

Himachal Pradesh

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      Himachal Pradesh

        उर्वरक

        किस्में
        तत्त्व
        उर्वरक
        (कि.ग्रा./है.)
        (कि.ग्रा./है.)
        (कि.ग्रा./बीघा)
        (कि. ग्रा./कनाल)
        ना.
        फा.
        पो.
        यूरिया
        एसएसपी
        एमओपी
        यूरिया
        एसएसपी
        एमओपी
        यूरिया
        एसएसपी
        एमओपी
        संकर व कम्पोजिट किस्में
        अधिक वर्षा 120 60 40 260 375 65 21 30 5 10 15 2.5
        कम वर्षा 90 45 30 195 280 50 15 22 4 8 11 2
        स्थानीय किस्में
        अधिक वर्षा 80 40 30 175 250 50 14 20 4 7 10 2
        कम वर्षा 60 30 20 130 185 33 10 15 3 5 7.5 1.5

         

        • ● मक्की की फसल में खाद व उर्वरकों की मात्रा निर्धारण में गली-सडी खाद की उचित मात्रा (10-15 टन प्रति हैक्टेयर) का विशेष स्थान है और यह हल्की व भारी मिट्टियों को विशेषकर भुरभुरा बनाने में सहायता करती है व भूमि की जल-धरण क्षमता को बढ़ाती है।
        • ● ऐसी भूमि में जहां पहली बार फसल उगाई जा रही हो, वहां गली-सड़ी खाद की अधिक आवश्यकता (30-40 टन / हैक्टेयर) होती है।
        • ● तेजाबी भूमियों में (पी.एच. <6) रॉक फास्फेट और सुपरफास्फेट के मिश्रण (50:50) को डालने से फसल को उतनी ही फास्फोरस मिलती है जितनी अकेले सुपरफास्फेट के देने से मिलती है। तेजाबी भूमियों में चूने की मात्रा मिट्टी परीक्षण के आधार पर देनी चाहिए।
        • ● नाईट्रोजन की एक तिहाई मात्रा व फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा बिजाई के समय खेत में डाल देनी चाहिए। नाईट्रोजन की एक तिहाई मात्रा उस समय दें, जब फसल घुटनों तक हो जाये और बाकी एक तिहाई मात्रा पाधौं में नरफूल (टैस्सल) निकलने से पहले डालें। निचले पहाड़ी क्षेत्रों में नाईट्रोजन का 1/8 भाग बिजाई के समय, 3/4 भाग फसल के घुटने तक आने के समय व शेष 1/8 भाग नरफूल के आने के पहले दें।
        • ● नाईट्रोजन की दूसरी व तीसरी मात्रा पंक्तियों के पौधों से 10-15 सें.मी. की दूरी पर दें व अच्छी तरह मिट्टी में मिला दें। उन क्षेत्रों में जहां फसल हवा से प्रायः गिर जाती है वहां नाईट्रोजन को थोड़ी देरी से दें जिससे पौधों की बढ़ोत्तरी देरी से होगी।

        ऊना व इन्दौरा क्षेत्रों में जहां जस्त की कमी पाई जाती है वहां जिंक सल्फेट 25 कि.ग्रा./हैक्टेयर बिजाई के समय खेत में डालें।

        अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में मक्की-गेहूँ फसल चक्र में गोबर की खाद का प्रयोग केवल मक्की की फसल में और फास्फोरस उर्वरक का प्रयोग केवल गेहूँ की फसल में अधिक लाभकारी है। यदि फास्फोरस उर्वरक बिना गोबर की खाद डालते रहें तो भूमि में जस्त की कमी आ जाती है।

        जस्त की कमी

        ● यदि पिछली फसल में जस्त की कमी के लक्षण पाये गये हों या मिट्टी परीक्षण जस्त की कमी बताए तो 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हैक्टेयर बिजाई के पहले डालें। परन्तु इसे किसी उर्वरक के साथ मिला कर न दें। यदि खड़ी फसल में जस्त की कमी नजर आये तो जिंक सल्फेट 0.5 प्रतिशत (5 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट और 2.5 कि.ग्रा. चूना 1000 लीटर पानी में घोलकर) छिड़काव प्रति हैक्टेयर करें।

        ● जस्त की कमी के लक्षण 2-3 सप्ताह की फसल में पत्तों पर सफेद या हल्के पीले रंग की चौड़ी धारियों के रूप में प्रकट होते हैं परन्तु पत्तों के सिरे हरे ही रहते हैं। यदि जस्त की कमी अत्याधिक हो तो छोटे पत्ते कोंपल में से ही सफेद और हल्के पीले निकलते हैं और इसे मक्की की व्हाईट बड बिमारी कहते हैं। 25-35 दिन के पौधों में नीचे से चौथे, पांचवे व छठे पत्तों के दोनों ओर सफेद दाग पड़ जाते हैं। जस्त की अत्याधिक कमी होने पर भी पत्तों के किनारे व ऊपर का एक तिहाई भाग ही रहता है।